मुजफ्फरपुर। शहर के प्रतिष्ठित महेश प्रसाद सिन्हा साइंस कॉलेज में आज 'भारतीय भाषा परिवार और भाषाई एकता' विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ने भाषाई गौरव और राष्ट्रीय एकता की एक नई अलख जगाई। भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) के सहयोग से आयोजित इस भव्य समागम में शिक्षाविदों ने स्पष्ट संदेश दिया कि कोई भी राष्ट्र अपनी मातृभाषा की उंगली थामकर ही उन्नति के शिखर तक पहुँच सकता है। कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन मुख्य अतिथि बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) दिनेश चंद्र राय द्वारा दीप प्रज्वलन और मंत्रोच्चार के बीच किया गया। कुलपति ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय राष्ट्र निर्माण का 'स्वर्णिम काल' है, जहाँ भारत की विविध भाषाएँ हमें अलग करने के बजाय एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही हैं।
सेमिनार के मुख्य वक्ता और ए.एम.यू. के भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद जहांगीर वारसी ने पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत को समस्त भारतीय भाषाओं की जननी करार दिया। उन्होंने 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की परिकल्पना में स्थानीय बोलियों के महत्व को रेखांकित किया। इसी क्रम में विशिष्ट अतिथि डॉ. सुजीत कुमार चौधरी ने विकसित देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षा और प्रगति का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा ही है। उद्घाटन सत्र के दौरान ही भारतीय भाषा समिति द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी किया गया, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की दिशा में एक बड़ा कदम है।
सेमिनार के तकनीकी सत्रों में वैचारिक विमर्श का दौर काफी गहरा रहा। वक्ताओं ने जहाँ एक ओर पिछले 200 वर्षों में विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय भाषाओं को हुई क्षति पर चिंता व्यक्त की, वहीं दूसरी ओर नई शिक्षा नीति (NEP-2020) के माध्यम से मातृभाषाओं के पुनरुत्थान पर संतोष जताया। एल.एन.टी. कॉलेज की प्राचार्या डॉ. ममता रानी ने हिंदी को राजभाषा से आगे बढ़कर राष्ट्रभाषा बनाने की पुरजोर वकालत की। शोध सत्र में फणीश्वर नाथ 'रेणु' के साहित्य के माध्यम से आंचलिक भाषाओं के प्रभाव पर चर्चा हुई, जिसमें डॉ. कृष्ण पासवान ने विस्तार से बताया कि कैसे रेणु के उपन्यासों में लोकभाषा का नैसर्गिक सौंदर्य झलकता है।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए पूर्व कुलपति डॉ. अमरेन्द्र कुमार यादव ने उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा को भाषाई माध्यम से जोड़ने पर बल दिया ताकि ग्रामीण और गरीब राज्यों का कायाकल्प हो सके। डॉ. प्रमोद कुमार और डॉ. ज्योति नारायण सिंह ने विज्ञान, तकनीक और संस्कारों के संवाहक के रूप में भाषाओं के आपसी संबंधों को स्पष्ट किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. वंदना श्रीवास्तव की पुस्तक 'भोजपुरी कला के बहाने' का विमोचन किया गया और सहभागी सवा सौ प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राजीव कुमार ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया, जबकि कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. आशुतोष और डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने किया।
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