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नेशनल फीचर डेस्क
23 मार्च 1931, लाहौर सेंट्रल जेल। शाम के सात बजने को थे। अमूमन जेल में यह वक्त खामोशी का होता है, लेकिन उस दिन हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी। वार्डन चरत सिंह, जिसने सालों से अपराधियों को फांसी चढ़ते देखा था, आज उसके पैर कांप रहे थे। वह उस कोठरी के बाहर खड़ा था जहाँ भारत के तीन सबसे लाडले बेटे अपनी जिंदगी की आखिरी घड़ी गिन रहे थे।
आखिरी मुलाकात: लेनिन और वो 'पागल' क्रांतिकारी
कोठरी नंबर 14 के भीतर 23 साल का एक नौजवान 'लेनिन' की जीवनी पढ़ने में मशगूल था। जब उसे बताया गया कि वक्त आ गया है, तो उसने मुस्कुराकर कहा— "ठहरो! एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।" पन्ना पलटा, किताब बंद की और उछलकर खड़ा हो गया। वह भगत सिंह थे। उनके चेहरे पर वह नूर था जिसे देखकर जल्लाद मसीह भी हैरान था।
वो 'त्रिमूर्ति' और बसंती चोला
बगल की कोठरी से सुखदेव और राजगुरु बाहर आए। तीनों ने एक-दूसरे को गले लगाया। जेल की कालकोठरियां गूंज उठीं उस तराने से जिसे सुनकर फिरंगियों की रूह कांप जाती थी— "मेरा रंग दे बसंती चोला..." हैरत की बात देखिए, जिन कैदियों को फांसी के तख्ते तक घसीटकर ले जाया जाता था, ये तीनों वहां 'मार्च' करते हुए जा रहे थे, जैसे किसी शादी के जश्न में जा रहे हों। रास्ते में वार्डन चरत सिंह ने फुसफुसाकर कहा— "पुत्तर, वाहेगुरु का नाम ले लो।" भगत सिंह मुस्कुराए और बोले— "चाचा, पूरी जिंदगी तो उसे याद नहीं किया, अब मौत सामने देख उसे याद करूँगा तो वह सोचेगा कि भगत डर गया।"
मौत को चूमने का वो मंजर
फांसी के तख्ते पर पहुंचकर तीनों ने काला नकाब पहनने से इनकार कर दिया। उन्होंने जल्लाद के हाथ से फांसी का फंदा लिया, उसे चूमा और खुद अपने गले में डाल लिया। राजगुरु ने अपनी आंखों में चमक के साथ फंदा कसा। सुखदेव के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। भगत सिंह ने ऊंची आवाज में नारा लगाया— "इंकलाब जिंदाबाद!" शाम के 7:33 बजे थे। लीवर खिंचा और पूरा लाहौर उस गूंज से कांप गया जो जेल की दीवारों को फाड़कर बाहर आई थी।
सतलुज का वो किनारा और अमर गाथा
अंग्रेज इतने डरे हुए थे कि उन्होंने शवों को पिछले दरवाजे से निकालकर फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे ले जाकर अधजला ही छोड़ दिया। उन्हें डर था कि अगर लाशें जनता को मिल गईं, तो पूरा हिंदुस्तान जल उठेगा। मगर वो भूल गए थे कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अब हाड़-मांस के इंसान नहीं रहे थे, वे एक 'विचार' बन चुके थे। एक ऐसा विचार जिसने 16 साल बाद अंग्रेजों को बोरिया-बिस्तर समेटने पर मजबूर कर दिया। आज हम जिस आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, उसमें उन तीन लड़कों की महक है जिन्होंने अपनी जवानी सिर्फ इसलिए वार दी ताकि हमारी नस्लें गुलामी की बेड़ियों में न जकड़ी रहें। नमन है उन मांओं को जिन्होंने ऐसे शेर पैदा किए!
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