समस्तीपुर जिले के मोरवा प्रखंड का एक छोटा सा गांव है बाजीतपुर करनैल। यहां के मध्य विद्यालय में जब सुबह की पहली घंटी बजती है, तो फिजाओं में सिर्फ प्रार्थना के स्वर नहीं गूंजते, बल्कि सुनाई देती हैं कुछ ऐसी आवाज़ें जो बेजान लकड़ियों और कागजों से निकलती हैं। यहां ब्लैकबोर्ड पर चाक की खड़खड़ाहट से ज्यादा बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई देती है। इस बदलाव की कहानी शुरू होती है शिक्षिका ज्योति श्वेता से, जिन्हें आज पूरा इलाका 'कठपुतली वाली मैम' के नाम से जानता है।
कबाड़ में छिपी है शिक्षा की चाबी :
अक्सर हम जिसे 'कबाड़' समझकर डस्टबिन में डाल देते हैं, ज्योति मैम के लिए वो बच्चों का भविष्य संवारने का सबसे बड़ा औजार है। पुराने अखबार, खाली पेपर कप, फटे-पुराने कपड़ों के टुकड़े और बेकार पड़े बोतलों के ढक्कन—बाजीतपुर करनैल स्कूल की क्लास में ये सब चीजें इकट्ठा होती हैं। यहां हर कबाड़ का अपना एक किरदार है। कोई कप 'राजा' बनता है, तो कोई लकड़ी का टुकड़ा 'मदारी'। ज्योति मैम ने अपनी रचनात्मकता से साबित कर दिया है कि बेहतर शिक्षा के लिए महंगे लैब या स्मार्ट क्लास से ज्यादा एक 'रचनात्मक सोच' की जरूरत होती है।
पेडागोजी का नया व्याकरण :
ज्योति श्वेता सिर्फ बच्चों का मनोरंजन नहीं कर रही हैं, बल्कि वे 'आर्ट इंटीग्रेटेड लर्निंग' के जरिए शिक्षा का एक नया व्याकरण लिख रही हैं। कठिन से कठिन इतिहास के पाठ हों या जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाएं, जब इन्हें कठपुतली (Puppetry) के माध्यम से पेश किया जाता है, तो बच्चे उसे कभी नहीं भूलते। ज्योति मैम बताती हैं कि कठपुतली एक ऐसा माध्यम है जो निर्जीव पाठ में भी जान फूंक देता है।
झिझक तोड़ती कठपुतलियां :
इस पूरे प्रयोग का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा है बच्चों का आत्मविश्वास। बाजीतपुर करनैल स्कूल में कई ऐसे बच्चे थे, जो अपनी बारी आने पर सिर झुका लेते थे। ज्योति मैम कहती हैं, "कठपुतली एक मुखौटे की तरह काम करती है। जब बच्चा कठपुतली के पीछे छिपता है, तो उसे लगता है कि वो नहीं, बल्कि वो पुतला बोल रहा है। बस यहीं से उसकी झिझक खत्म होती है और वो बेधड़क होकर संवाद करने लगता है।" आज यहां के बच्चे खुद कठपुतलियां बनाते हैं, उन्हें नचाते हैं और समाज की कुरीतियों पर अपनी आवाज बुलंद करते हैं।
हैदराबाद से बाजीतपुर तक का सफर :
ज्योति श्वेता का यह हुनर रातों-रात पैदा नहीं हुआ। उन्होंने CCRT हैदराबाद से प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली और समस्तीपुर जिले का मान बढ़ाया। उन्होंने वहां यमपुरी, रावण छाया और धागे वाली कठपुतलियों की बारीकियों को समझा और फिर ठान लिया कि वे इस प्राचीन भारतीय विरासत को लुप्त नहीं होने देंगी। आज बाजीतपुर करनैल के बच्चे अपनी मिट्टी की कला से जुड़े हुए हैं।
बदलाव की एक नई किरण :
आज के डिजिटल युग में, जहां बच्चे मोबाइल स्क्रीन में सिमटे जा रहे हैं, ज्योति मैम ने उन्हें हाथों से कुछ नया रचने की प्रेरणा दी है। उनकी इस मेहनत का असर है कि स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ गई है। ग्रामीणों के लिए भी ज्योति मैम एक रोल मॉडल बन चुकी हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक अगर चाहें, तो देश की शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर बदल सकते हैं। ये कठपुतलियां आज पूरे बिहार को संदेश दे रही हैं कि "जहां चाह, वहां राह"।
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