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NATIONAL NEWS DESK
1.4 अरब की आबादी वाले भारत को भले ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त हो, लेकिन 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (Reporters Without Borders) द्वारा जारी 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026' में भारतीय मीडिया की एक बेहद भयावह तस्वीर सामने आई है । 180 देशों की इस सूची में भारत अब लुढ़ककर 157वें पायदान (स्कोर: 31.96) पर पहुंच गया है । पिछले साल 151वें स्थान पर मौजूद भारत का यह पतन महज़ एक आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रामाणिक दस्तावेज़ है कि देश में स्वतंत्र पत्रकारिता एक "अघोषित आपातकाल" से गुज़र रही है ।
नॉर्वे से भारत तक: आज़ादी बनाम सत्ता का नियंत्रण
इस सूचकांक में शीर्ष पर काबिज देशों की स्थिति देखें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। स्कैंडिनेवियाई देश नॉर्वे इस सूची में पहले नंबर पर है, जिसके बाद नीदरलैंड (दूसरे) और एस्टोनिया (तीसरे) का स्थान आता है । इन देशों का मॉडल बताता है कि असली लोकतंत्र में प्रेस सत्ता की आँखों में आँखें डालकर बेखौफ सवाल पूछने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। इसके ठीक उलट, भारत में मीडिया अब बहुलवाद के बजाय सत्ता और कॉर्पोरेट जगत के एकाधिकार का बंधक बनता जा रहा है। भारत में 900 निजी टीवी चैनल और 1,40,000 से अधिक समाचार पत्र-पत्रिकाएं होने के बावजूद, असल मुद्दों और विचारों की विविधता न्यूज़रूम से गायब हो चुकी है ।
पूंजीपति, 'गोदी मीडिया' और ख़त्म होता बहुलवाद
साल 2014 के बाद से सत्ताधारी दल और मीडिया पर काबिज बड़े कॉर्पोरेट घरानों के बीच का गठजोड़ ऐतिहासिक रूप से मजबूत हुआ है । रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी के पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट्स का नियंत्रण है, जिनकी पहुंच कम से कम 80 करोड़ भारतीयों तक है । वहीं, गौतम अडानी द्वारा 'एनडीटीवी' (NDTV) का आक्रामक अधिग्रहण इस बात का खुला प्रमाण है कि मुख्यधारा के मीडिया से आलोचनात्मक और स्वतंत्र पत्रकारिता के बचे-खुचे गढ़ों को भी कैसे बेदखल किया जा रहा है । इसी भारी आर्थिक और राजनीतिक दबाव के बीच उस "गोदी मीडिया" का जन्म हुआ है, जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को ताक पर रखकर केवल लोकलुभावनवाद और सत्ता का प्रोपेगैंडा परोस रहा है ।
कानूनी शिकंजा और तंत्र की 'मनमानी'
भले ही भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि सरकारों और जांच एजेंसियों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि सवाल पूछने वालों पर औपनिवेशिक काल के राजद्रोह, मानहानि और आतंकवाद निरोधी (एंटी-टेरर) कानूनों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है । साल 2023 में लाए गए 'टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट' और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' जैसे नए कानूनों ने सरकार को मीडिया को नियंत्रित करने और सेंसरशिप थोपने की असीमित ताकत दे दी है । हालात यह हैं कि देश के शीर्ष नेतृत्व की ओर से खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की जातीं; इसके बजाय केवल उन चुनिंदा चेहरों या यूट्यूबर्स को इंटरव्यू दिए जाते हैं जो उनके अनुकूल नैरेटिव गढ़ने में मदद करते हैं ।
बंदूक के साये और नफरत के बीच रिपोर्टिंग
पत्रकारों की सुरक्षा के लिहाज़ से भारत आज दुनिया के सबसे खतरनाक देशों की कतार में है । यहां हर साल औसतन दो से तीन पत्रकारों की उनके काम के कारण हत्या कर दी जाती है । जो पत्रकार सत्ता से असहमति जताते हैं, उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ताओं से लेकर पुलिस तक के कोप का भाजन बनना पड़ता है । सत्ता समर्थित ऑनलाइन ट्रोल आर्मी आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ नफरत भरा अभियान चलाती है, जो महिला पत्रकारों के मामले में और भी वीभत्स हो जाता है, जहां उनकी निजी जानकारी तक सार्वजनिक कर दी जाती है । इसके अलावा, मुख्यधारा के मीडिया (खासकर हिंदी टीवी चैनलों) का एक बड़ा हिस्सा अब सिर्फ धार्मिक मामलों और बहुसंख्यकवादी विचारधारा को हवा देने में लगा है, जबकि टॉक शोज़ में महिलाओं (15% से भी कम) और हाशिए के समाज की भागीदारी न के बराबर रह गई है । यह ताज़ा रिपोर्ट महज़ एक वैश्विक रैंकिंग नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चौथे स्तंभ के दरकने का सीधा अलर्ट है। जब तक पत्रकारिता को पूंजी और सत्ता की मनमानी से मुक्त कर पत्रकारों को एक सुरक्षित माहौल नहीं दिया जाता, तब तक भारत के लोकतांत्रिक मूल्य केवल नारों और कागज़ों तक ही सीमित रहेंगे।
यहां देखें 180 देशों की पूरी सूची जिसमें भारत 157वें स्थान पर है।

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