आज जब खबरों की दुनिया युद्ध, हत्या, लूट, बलात्कार, नफरत, दंगे और अपराध की सुर्खियों से भरी हुई है, तब कभी-कभी कोई ऐसी कहानी सामने आती है जो इंसानियत पर हमारा भरोसा फिर से मजबूत कर देती है। बीते कुछ महीनों में मैंने हजारों खबरें पढ़ीं, देखीं और लिखीं। लेकिन मानवता, ममता और निस्वार्थ सेवा का जो उदाहरण मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित कर गया, वह किसी बड़े राजनीतिक फैसले, किसी अरबों की परियोजना या किसी रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह कहानी है एक ऐसी खिलाड़ी की, जिसने कोर्ट पर देश के लिए मेडल जीते, लेकिन मां बनने के बाद अपनी ममता को उन मासूम बच्चों तक पहुंचा दिया जिन्हें जिंदगी की सबसे ज्यादा जरूरत थी। मेरी नजर में यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि इंसानियत का एक जीवंत दस्तावेज है। यह याद दिलाती है कि दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं जिनकी वजह से उम्मीद जिंदा है।
पढ़िए यह विशेष फीचर स्टोरी—
एक भरा हुआ बैडमिंटन कोर्ट। स्टैंड्स में हज़ारों की भीड़ का कान फोड़ता शोर। हवा में तैरती एक सफेद शटलकॉक और उसे चीरता हुआ ज्वाला गुट्टा का वो कड़कड़ाता हुआ बाएँ हाथ का स्मैश! सालों तक देश ने ज्वाला को इसी तेवर में देखा—बागी, आक्रामक, और कभी न झुकने वाली। विरोधी उनके नाम से कांपते थे और मेडल उनके गले की आदत बन चुके थे।
लेकिन खेल के उस गगनभेदी शोर, कैमरों की चकाचौंध और सोशल मीडिया रील्स की दुनिया से बहुत दूर, हैदराबाद की उमस भरी एक दोपहर में मातृत्व के एक बेहद शांत कमरे में कुछ अलग ही घट रहा था।
वहाँ कोई रैकेट नहीं था, कोई विरोधी नहीं था। कमरे के कोने में चल रहे एयरकंडीशनर की हल्की सरसराहट के बीच देश की स्टार खिलाड़ी एक सोफे पर बेहद शांत बैठी थी। उसके चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था। उसके ठीक सामने एक छोटा सा 'ब्रेस्ट मिल्क पंप' रखा था। मशीन की हल्की, लयबद्ध घरघराहट के बीच, दूध की एक-एक बूंद कांच की शीशी में टपक रही थी।
हर कुछ घंटों में इस थका देने वाले रूटीन को दोहराना। रात के दो बजे, जब पूरी दुनिया सो रही होती, तब भी वह जाग रही थी। मां बनने के बाद बदन का वो असहनीय दर्द, एक एथलीट की मांसपेशियों का खिंचाव और रातों की अधूरी नींद... लेकिन वह रुकती नहीं थी। अपने बच्चे का पेट भरने के बाद बची हुई ममता की एक-एक बूंद को सहेजकर जब यह तपस्या मुकम्मल हुई, तो अस्पतालों के फ्रीजर्स में 60 लीटर 'अमृत' महफूज रखा था।
अब इस कमरे की शांति से सीधे निकलिए और चलिए किसी सरकारी अस्पताल के NICU (नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट) के गलियारे में।
यहां की हवा में डिटर्जेंट और दवाइयों की एक तीखी गंध है। कानों में लगातार मशीनों की 'बीप-बीप' गूंज रही है। कांच के एक छोटे से बक्से के अंदर, सफेद तेज रोशनी के नीचे एक नवजात लेटा है। वजन मुश्किल से नौ सौ ग्राम। उसकी नन्ही छाती इतनी तेजी से ऊपर-नीचे हो रही है मानो वह सांसों के लिए किसी अदृश्य दुश्मन से लड़ रहा हो। उसके छोटे से हाथ में लगी ड्रिप की सुई देखकर रूह कांप जाती है। ये वो बच्चे हैं जो वक्त से पहले इस दुनिया की कड़ाके की धूप में आ गए।
कांच के उस बक्से के ठीक बाहर, दीवार से पीठ टिकाए एक बेबस, गरीब मां बैठी है। फटी हुई सूती साड़ी का पल्लू उंगलियों में भींचती हुई, उसकी पथराई आँखें बस डॉक्टर के होठों को हिलते हुए देख रही हैं। सिजेरियन डिलीवरी के बाद उसका अपना शरीर इतना टूट चुका है कि छाती से दूध की एक बूंद तक नहीं उतरी। वह बस रोते हुए ईश्वर से अपने बच्चे की आखिरी सांसों की भीख मांग रही है।
ठीक उसी पल, वार्ड का दरवाजा खुलता है। एक नर्स के हाथ में बर्फ के डिब्बे से निकाली गई एक छोटी सी शीशी है। उस शीशी पर जमी बर्फ की हल्की सी परत के पीछे हैदराबाद के उसी शांत कमरे का तापमान छिपा है। नर्स ड्रॉपर से उस 'लिक्विड गोल्ड' की दो बूंदें उस मासूम के सूखे होठों पर टपकाती है।
पल भर के लिए मॉनिटर की वो भागती हुई टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें, जो मौत का इशारा कर रही थीं, ठहर जाती हैं। बच्चे के नन्हे पैर का अंगूठा हल्का सा हिलता है। हलक से दूध नीचे उतरते ही मशीनों की वो डरावनी 'बीप' एक सामान्य धड़कन की लय में बदल जाती है। एक बुझता हुआ चिराग दोबारा जी उठता है।
कैसा अद्भुत संयोग है न? वह गरीब मां यह भी नहीं जानती कि बैडमिंटन क्या होता है या ज्वाला गुट्टा कौन हैं। वे बच्चे कभी नहीं जान पाएंगे कि उनकी रगों में जो नई जिंदगी दौड़ रही है, उसका ताल्लुक देश के लिए जीते गए किसी गोल्ड मेडल से है। और ज्वाला भी शायद उन नन्हे चेहरों को कभी नहीं देख पाएंगी, जिनकी किस्मत को उन्होंने अपने दूध से दोबारा लिख दिया।
ग्लैमर की चकाचौंध के बीच रहकर, बिना किसी ढोल-नगाड़े के इस शांत क्रांति को अंजाम देना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए एक खिलाड़ी वाले फौलादी अनुशासन और एक माँ वाले असीम कलेजे की जरूरत होती है।
खिलाड़ियों के मेडल तो एक दिन अलमारियों की शोभा बन जाते हैं। रिकॉर्ड बुक्स के पन्ने पीले पड़ जाते हैं और नए खिलाड़ी आकर पुराने रिकॉर्ड्स को इतिहास के मलबे में दबा देते हैं। लेकिन ज्वाला गुट्टा ने जो इतिहास ममता की इस मूक स्याही से लिखा है, उसकी चमक कभी मद्धम नहीं पड़ेगी।
कोर्ट की जीतें तो सिर्फ कागजों पर दर्ज होती हैं, लेकिन यह 60 लीटर का महादान अब इस देश के न जाने कितने बेसहारा मासूमों की धड़कनों में हमेशा के लिए धड़कता रहेगा। रैकेट भले ही अब शांत हो, लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा मैच इस मां ने सीधे सेटों में जीत लिया है।
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