नन्हीं उंगलियों का जादुई स्पर्श : मधुबनी कला के नव-सृजन से निखरा उत्क्रमित मध्य विद्यालय लगुनियाँ सूर्यकंठ

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न्यूज डेस्क। समस्तीपुर

शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह दीवारों पर उकेरी गई संस्कृति में भी सांस लेती है। समस्तीपुर के उत्क्रमित मध्य विद्यालय लगुनियाँ सूर्यकंठ ने इसी सत्य को चरितार्थ करते हुए अपने परिसर की दीवारों पर सजी मधुबनी चित्रकला को नया जीवन देकर रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना की एक अनूठी मिसाल पेश की है। लगभग पाँच वर्ष पूर्व, विद्यालय के प्रधानाध्यापक सौरभ कुमार के दूरदर्शी नेतृत्व और मार्गदर्शन में कक्षा-कक्षों की बाहरी दीवारों को इस अत्यंत आकर्षक और मनोहारी कला से सुसज्जित किया गया था। उस समय इन जीवंत चित्रों ने पूरे विद्यालय के वातावरण को सौंदर्य और संस्कृति से ओत-प्रोत कर दिया था।

समय बीतने के साथ प्राकृतिक कारणों से इन चित्रों की चमक धूमिल पड़ने लगी थी और कई जगहों से रंग झड़ने लगे थे। दीवारों की इस म्लान होती शोभा को देखकर प्रधानाध्यापक के मन में इन कलाकृतियों को पुनर्जीवित करने का विचार आया। इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए "बैगलेस शनिवार" की रचनात्मक गतिविधि के अंतर्गत विद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने मिलकर अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को फिर से संवारने का दृढ़ संकल्प लिया।


इन छात्राओं ने निभाई भूमिका : 

इस 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' में सबसे अहम भूमिका विद्यालय की होनहार बेटियों ने निभाई। कक्षा आठ की छात्राओं—दिव्यांशी, कनक, श्वेता, नैन्सी और अन्नु—ने पूरे उत्साह, लगन और कलात्मक अभिरुचि के साथ इस कार्य में अपनी सहभागिता दर्ज की। इन छात्राओं और शिक्षकों के संयुक्त प्रयास से फीकी पड़ चुकी रेखाओं में एक बार फिर से उजले रंग भरे गए। प्रभावित हिस्सों को पूरी सावधानी से सुधारा गया और पारंपरिक शैली की बारीकियों को सहेजते हुए चित्रों में नए प्राण फूंके गए।


मधुबनी की जीवंत आकृतियों से आलोकित हुआ परिसर : 

आज इस अद्भुत सामूहिक प्रयास के परिणामस्वरूप विद्यालय की दीवारें एक बार फिर मधुबनी की जीवंत आकृतियों से आलोकित हो उठी हैं और संपूर्ण परिसर का सौंदर्य अत्यंत आकर्षक व प्रेरणादायक प्रतीत हो रहा है। विद्यालय परिवार का यह प्रयास न केवल कला-संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह विद्यार्थियों के भीतर सृजनात्मकता, आपसी सहयोग और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने की भावना को विकसित करने का एक बेहद जीवंत उदाहरण भी बन गया है।