बड़ी कार्रवाई: फर्जी शिक्षकों की बहाली में फंसे पूर्व BEO कृष्णदेव महतो, आजीवन पेंशन से होगी 40% की कटौती

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न्यूज डेस्क। समस्तीपुर 

शिक्षा विभाग ने एक कड़ा फैसला लेते हुए समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के तत्कालीन प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) कृष्णदेव महतो के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की है। प्राथमिक शिक्षा निदेशालय ने आदेश दिया है कि अब सेवानिवृत्त हो चुके कृष्णदेव महतो की पेंशन से 40 प्रतिशत की स्थायी कटौती की जाएगी। उन पर विभूतिपुर में पदस्थापन के दौरान पद का दुरुपयोग करने, वित्तीय अनियमितता बरतने और विभागीय आदेशों की अवहेलना करने के गंभीर आरोप सिद्ध हुए हैं। ​जांच प्रतिवेदन और साक्ष्यों के आधार पर कृष्णदेव महतो के खिलाफ कुल 10 आरोपों में से 9 आरोप पूरी तरह प्रमाणित पाए गए हैं। सबसे गंभीर आरोप प्रधानाध्यापकों से मिलीभगत कर 08 फर्जी BPSC शिक्षकों का स्कूल में योगदान कराने का था।

जांच में इन मामलों में पाये गये दोषी :
 
जांच में स्पष्ट हुआ कि उन्होंने उच्चाधिकारियों को सूचित करने के बजाय साक्ष्यों को नजरअंदाज किया और शिक्षकों के थम्ब इम्प्रेशन में विसंगति के बावजूद कार्रवाई नहीं की। पंचायत शिक्षिका सोमी कुमारी, जिसका नियोजन 2015 में ही रद्द हो चुका था, उसे कृष्णदेव महतो ने 2023 में मनमाने तरीके से दोबारा योगदान कराया। ​वेतन भुगतान में लापरवाही: प्रखंड के 40 प्रेरकों/समन्वयकों के लंबित वेतन भुगतान के लिए आवश्यक अभिलेख जिला कार्यालय को उपलब्ध नहीं कराए, जिससे उनका भुगतान बाधित रहा। इसे घोर अनुशासनहीनता और धृष्टता माना गया है। विभागीय नियमों के विरुद्ध जाकर शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में प्रतिनियुक्त किया, जो उनकी गलत मंशा को दर्शाता है। अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी, रोसड़ा के आदेशों का अनुपालन नहीं करने और परिवादों के निस्तारण में व्यक्तिगत रुचि नहीं लेने के आरोप भी सिद्ध हुए हैं।

पद के दुरुपयोग पर ​विभाग का सख्त रुख :

​प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विरकर द्वारा जारी आदेश (ज्ञापांक 453, दिनांक 06.04.2026) में कहा गया है कि आरोपी पदाधिकारी का आचरण एक सरकारी सेवक के अपेक्षित व्यवहार के बिल्कुल प्रतिकूल है। यह मामला सामान्य प्रशासनिक त्रुटि का नहीं, बल्कि निरंतर कर्तव्यहीनता और पद के दुरुपयोग का है। ​बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत दोषी कृष्णदेव महतो पर "40% पेंशन कटौती" का दंड अधिरोपित किया गया है। विभाग के इस फैसले से शिक्षा जगत में हड़कंप मचा हुआ है, खासकर उन अधिकारियों के बीच जो नियुक्ति और प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता नहीं बरतते हैं।