नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (NCI) AIIMS- 2 की हॉस्पिटल इन्फेक्शन कंट्रोल कमेटी की ताजा इंटरनल रिपोर्ट ने अस्पताल के भीतर स्वच्छता के दावों की कलई खोल दी है। रिपोर्ट के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि वार्डों में हैंड हाइजीन को लेकर बरती जा रही ढिलाई मरीजों की रिकवरी में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है। इस ऑडिट का मकसद अस्पताल के भीतर संक्रमण की कड़ियों को तोड़ना था, लेकिन नतीजों ने प्रशासन और नर्सिंग स्टाफ की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीएमटी बना स्वच्छता का रोल मॉडल, डे केयर दूसरे स्थान पर :
संक्रमण मुक्त वातावरण तैयार करने में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) विभाग ने बाजी मारी है। 72 प्रतिशत के बेहतरीन स्कोर के साथ बीएमटी टॉप पर रहा है, जो यह दर्शाता है कि कड़े अनुशासन से इन्फेक्शन को नियंत्रित किया जा सकता है। वहीं, डे केयर विभाग 57 प्रतिशत अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहा, जो संतोषजनक श्रेणी में आता है। रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक स्थिति वार्ड 6/40 की पाई गई है। यह विभाग स्वच्छता मानकों में केवल 22 प्रतिशत स्कोर ही हासिल कर सका, जिससे यह सभी विभागों की सूची में नीचे से तीसरे पायदान पर आ गया है। कैंसर के मरीजों के लिए यह लापरवाही बेहद संवेदनशील है क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कम होती है।
नर्सिंग अधिकारियों को सख्त हिदायत, एसआर संभालेंगे कमान
रैंकिंग में आई इस भारी गिरावट को देखते हुए डॉक्टरों ने वार्ड 6/40 के नर्सिंग अधिकारियों को सख्त चेतावनी जारी की है। उन्हें दो टूक कहा गया है कि मरीजों की सेहत के साथ ऐसा खिलवाड़ अब बर्दाश्त नहीं होगा। सीनियर रेजिडेंट्स (SR) को निर्देश दिए गए हैं कि वे WHO के मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराएं। इसके लिए एक खास फॉर्मेट भी लागू किया गया है, जिसमें अब नर्सिंग स्टाफ के हर कदम की निगरानी की जाएगी। डॉक्टर ने नर्सिंग ऑफिसर्स से फीडबैक भी लिया। पूछा कि उन्हें इस प्रोटोकॉल को मेंटेन करने में क्या परेशानी होती है। कहा कि शिकायत मिली कि सेनेटाइजर की गुणवत्ता ठीक नहीं है। उसकी जांच की गई है अब बेहतर गुणवत्ता वाले सैनिटाइजर की आपूर्ति कराई जाएगी।
परिजनों को दी नसीहत:
सैनिटाइजर का इस्तेमाल नहीं तो इलाज का फायदा नहीं डॉक्टरों ने मरीज के परिजनों को जागरूक करते हुए कहा कि बाहर से आने वाले लोगों के हाथों में अनगिनत कीटाणु छिपे होते हैं। बिना हाथ धोए या सैनिटाइज किए मरीज को छूना उनके शरीर पर सीधे संक्रमण का हमला है। इस कारण जो मरीज कुछ दिनों में ठीक हो सकता है, वह हफ्तों तक अस्पताल के बिस्तर पर रहने को मजबूर हो जाता है। इससे न केवल मरीज को शारीरिक कष्ट होता है, बल्कि परिवार पर मानसिक और आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
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