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न्यूज डेस्क। मुजफ्फरपुर
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) मुजफ्फरपुर में नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों रुपये के बंदरबांट की तैयारी है। एक ओर बिहार सरकार ने विश्वविद्यालयी कामकाज में पारदर्शिता और कम खर्च के लिए 'समर्थ पोर्टल' अनिवार्य किया है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (UMIS) नामक निजी एजेंसी पर मेहरबानी बरसा रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि जिस सिस्टम को पूर्व राज्यपाल 'समस्याओं की जड़' बता चुके हैं, उसका बजट हर साल तेजी से बढ़ाया जा रहा है। छात्रों की परेशानी बनी हुई है। समस्याओं का आलम यह है कि कभी परिणाम पोर्टल पर नहीं दिखता तो कभी फीस जमा करने के बाद उसका विवरण गायब हो जाता। इसके बाद भी करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार इस विश्वविद्यालय में कार्य कर रही एक निजी एजेंसी पूर्व में छात्रों का डेटा लेकर भाग चुकी है। इस कारण छात्र-छात्राओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था।
तीन साल में बजट ₹15.92 करोड़ से बढ़कर ₹19.26 करोड़ हुआ
विश्वविद्यालय के रिकार्ड केअनुसार, UMIS के बजट में होने वाली रहस्यमयी वृद्धि चौकाने वाली है। आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्वविद्यालय ने इस निजी एजेंसी के लिए खजाना खोल रखा है। सीनेट की बैठकों में भी सदस्य इस पर सवाल उठा चुके हैं कि जब मूल खर्च महज 7 करोड़ के आसपास था, तो बजट को बढ़ाकर 19 करोड़ तक ले जाने का क्या औचित्य है? एमएलसी प्रो.संजय कुमार सिंह ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे विश्वविद्यालय की 'मनमानी' करार दिया है।
| वित्तीय वर्ष | प्रस्तावित बजट (करोड़ में) |
| 2024-25 | ₹15.92 |
| 2025-26 | ₹17.52 |
| 2026-27 | ₹19.26 |
'समर्थ' के रहते UMIS से मोह क्यों?
शिक्षा विभाग का स्पष्ट निर्देश है कि नामांकन, परीक्षा, रिजल्ट, डिग्री और वेतन-पेंशन जैसे तमाम कार्य समर्थ पोर्टल के माध्यम से ही किए जाएं। समर्थ पोर्टल सरकारी होने के कारण न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि इसका मेंटेनेंस खर्च भी नगण्य है। विश्वविद्यालय ने वेतन और पेंशन के लिए तो इसे अपनाया है, लेकिन छात्रों से जुड़े मॉड्यूल (नामांकन और परीक्षा) में जानबूझकर सुस्ती बरती जा रही है।
सूत्रों की मानें तो UMIS से जुड़े कर्मियों और विश्वविद्यालय के आला अधिकारियों के बीच गहरी 'सांठगांठ' है। अगर समर्थ पोर्टल पूरी तरह सक्रिय हो गया, तो करोड़ों का यह 'बजट खेल' समाप्त हो जाएगा। यही कारण है कि एजेंसी के लोग अधिकारियों को 'साधने' और अपनी सेवाएं बरकरार रखने के लिए पूरी फील्डिंग सेट करने में जुटे हैं।
पूर्व राज्यपाल ने दी थी चेतावनी, एजेंसियां कर रहीं 'ब्लैकमेल'
बिहार के पूर्व राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने 2024 की सीनेट बैठक में स्पष्ट कहा था कि बिहार के विश्वविद्यालयों में नामांकन और सत्र की देरी की मुख्य वजह ये निजी एजेंसियां (UMIS) ही हैं। उन्होंने चिंता जताई थी कि छात्रों का डेटा इन प्राइवेट एजेंसियों के पास होता है, जिसका उपयोग वे विश्वविद्यालय को 'ब्लैकमेल' करने के लिए करती हैं। उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों को अपना स्वतंत्र सिस्टम विकसित करने की सलाह दी थी, जिसे दरकिनार कर दिया गया।
बीएड प्रवेश परीक्षा पर भी टिकी है नजर :
वर्तमान में बिहार विश्वविद्यालय को बीएड प्रवेश परीक्षा के लिए राज्य स्तरीय नोडल केंद्र बनाया गया है। इसके लिए वेबसाइट निर्माण और डेटा मैनेजमेंट का बड़ा काम होना है। चर्चा है कि एजेंसी के लोग इस प्रोजेक्ट को भी हथियाने के लिए अधिकारियों की परिक्रमा कर रहे हैं, ताकि सरकारी पोर्टल की जगह निजी हितों को प्राथमिकता दी जा सके।
क्या कहते हैं जानकार?
शिक्षाविदों का कहना है कि जब सरकार एक निशुल्क और पारदर्शी विकल्प (समर्थ) दे रही है, तो जनता की गाढ़ी कमाई के 19 करोड़ रुपये एक निजी एजेंसी को देना वित्तीय अनियमितता का स्पष्ट मामला है। इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए कि आखिर किसके दबाव या लालच में विश्वविद्यालय प्रशासन सरकार के निर्देशों की अवहेलना कर रहा है।
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