राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव : बादलों के वैभवशाली कैद में गूंजती आजादी की तड़प, 'आसमान जोगी' का अहंकार टूटा

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न्यूज डेस्क। मुजफ्फरपुर
बादलों की सुनहरी कैद, सुख-सुविधाओं का अंबार, लेकिन भीतर सुलगती आजादी की तड़प। जब अहंकार और विलासिता का टकराव मानवीय संवेदनाओं से होता है, तो सत्ता के ऊंचे महल भी ढह जाते हैं। आकृति रंग संस्थान की ओर से जिला स्कूल मैदान में आयोजित पांच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन रविवार को कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला। उदयपुर की सुप्रसिद्ध नाट्य मंडली 'रंगमस्ताने' ने विजयदान देथा की अमर कृति ‘आसमान जोगी’ का जीवंत मंचन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
नाटक का विधिवत उद्घाटन प्रो. व्यास नंदन शास्त्री, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ. भावना, प्रो. रेणु कुमारी, प्रो. श्यामबाबू शर्मा, प्रो. कहकशां, प्रो. प्रमोद कुमार, प्रो. हरिश्चंद्र प्रसाद यादव, डॉ. अविनाश कुमार और डॉ. सुनील कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन सत्यम कुमार सिंह ने किया।

लोकधुनों में गुंथा मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज : 
कथाकार विजयदान देथा की लेखनी जब राजस्थानी लोकधुनों के साथ मंच पर उतरी, तो वह महज एक नाटक नहीं रहा, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज बन गया। निर्देशक अभिषेक मुद्गल के निर्देशन में यह प्रस्तुति पारंपरिक ढर्रे से अलग 'कथा-गायन' और 'वाचन' की अनूठी शैली में पिरोई गई थी। मंच पर कलाकार न केवल पात्रों को जी रहे थे, बल्कि एक सूत्रधार के रूप में दर्शकों से सीधा संवाद भी कर रहे थे। संगीत और अभिनय के इस अद्भुत संगम ने शब्दों और स्वरों को एक-दूसरे का पूरक बना दिया।

आसमान जोगी: सोने का पिंजरा भी आखिर पिंजरा ही है :
कहानी के केंद्र में 'आसमान जोगी' का रहस्यमयी और अलौकिक चरित्र रहा। अपनी जादुई शक्तियों के मद में चूर यह जोगी स्त्रियों का अपहरण कर उन्हें बादलों के बीच स्थित वैभवशाली महलों में कैद कर देता था। बाहर से देखने पर ये महल सुख-सुविधाओं के स्वर्ग प्रतीत होते, लेकिन भीतर कैद स्त्रियां अपनी मुक्ति के लिए छटपटाती रहीं। नाटक ने बड़ी खूबसूरती से इस सत्य को स्थापित किया कि विलासिता कभी भी स्वतंत्रता का विकल्प नहीं हो सकती। जोगी का प्रचंड अहंकार और उसका 'स्वामित्व बोध' अंततः स्त्रियों के संगठित मौन प्रतिरोध के सामने घुटने टेक देता है।

दृश्य-श्रव्य उत्सव और गहरा संदेश :
राजस्थानी लोक-संस्कृति की खुशबू और आधुनिक रंग-चेतना के मेल ने इस नाटक को एक दृश्य-श्रव्य उत्सव बना दिया। कलाकारों ने बहुआयामी भूमिकाएं निभाईं; वे क्षण भर में पात्र बनते तो अगले ही पल कथावाचक। नाटक ने यह कड़ा संदेश दिया कि भौतिक सुख देकर किसी की आत्मा को गुलाम नहीं बनाया जा सकता। 'आसमान जोगी' का महल आज के उन सामाजिक बंधनों का प्रतीक है, जो सुरक्षा के नाम पर आजादी छीन लेते हैं। स्त्रियों का 'मौन प्रतिरोध' यह सिखा गया कि सत्य की लड़ाई के लिए शोर नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है।

कार्यशाला में निखरा छात्रों का हुनर :
महोत्सव के दौरान पेंटिंग और थियेटर के छात्रों के लिए विशेष वर्कशॉप का भी आयोजन हुआ। रंग निर्देशक अभिषेक मुद्गल ने छात्रों को अभिनय की बारीकियां सिखाईं, वहीं पेंटिंग के विद्यार्थियों ने लाइव प्रदर्शन कर अपनी कला का परिचय दिया। आयोजन की सफलता में डॉ. संजय सुमन, डॉ. सुनील फेकानिया, डॉ. सुशांत, डॉ. संतोष सारंग, विनय, प्रभात कुमार, वीरेन नंदा, यशवंत पराशर, नदीम खान, सुजीत कुमार, अशोक अंदाज और कुंदन कुमार की सक्रिय भूमिका रही।